जमीं कह रही
आसमान से कि
प्यासे हैं मेरे लब
एक अरसे से
टूटकर बरस जाओ मुझ पर और
मेरी प्यास बुझा दो
तृप्त हो जाऊं जब मैं थोड़ा तो
कुछ पल को ठहर जाना फिर
आहिस्ता आहिस्ता
एक प्रेम से भरे लम्हे के अहसास की तरह ही
मेरी रूह के अक्स में कहीं
हमेशा के लिए ठहर जाना
तुम्हारे सफर की मंजिल मैं ही थी तुम्हारे दरिया के वेग का किनारा मैं ही थी
तुम्हारी हस्ती की पहचान मैं ही थी तुम्हारी हमसफर
तुम्हारे कदमों की हमशक्ल मैं ही थी मुझसे आगे अब और कहीं न जाना चाहे तो अपने घर वापस लौट जाना
दूर से ही सही
मुलाकातें पर रोज होंगी अपनी
जब भी दिल करे
आसमान से उतरना और
मेरे अरमानों को अपने अहसासों की बौछार से भीगो जाना।
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