मेरी मां के जन्म दिवस पर


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आसमान की तरफ देखा तो
चांद की चमकती बाली जैसे
मुझे हिला रही हो हाथ
कभी हवाओं तो
कभी बादलों संग लहराई
मेरी मां के जन्म दिवस पर
मेरी दिवंगत मां आज मुझे बहुत याद आई
ऐसा कौन सा दिन है
कौन सा वह क्षण
जब मैं भूलती होंगी
उन्हें पल भर को भी
यूं तो वो रहती
मेरे दिल के ही किसी कोने में
फिर भी प्यासी आंखों से
हर मां के चेहरे में
उन्हें ढूंढूं मैं
कल की ही तो बात थी
जब वो थी मेरे साथ
आज न जाने किस दुनिया में
चली गई
छुड़ाकर मेरा हाथ
मां इतनी जल्दी भी क्या थी
तुम्हें यह दुनिया छोड़कर कहीं जाने की सोचा नहीं तुमने कि तुम्हारे बिना तुम्हारी बेटी कैसे जी पायेगी
मालूम था ना तुम्हें यह तो
भली-भांति कि
वह नहीं थी आज के कलयुगी
बच्चों सी
वह तो थी एक श्रवण कुमार
अपने माता-पिता के लिए
त्याग दिया था उसने अपना
सर्वस्व
अपने मां-बाप के लबों पर
उसके कारण बरबस आती
एक मुस्कुराहट के लिये।


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