जिंदगी में
मुझे जो मिला
मैंने सब कुछ ठुकरा दिया
एक ठोकर मारकर
उसे धूल के गुबार सा ही उड़ा दिया
मुझे कुछ अच्छा लगता है तो बस
खुद का साथ
तन्हाई में शहनाई बजाते रहने का मैं आदी हो गया हूं
मेरे रास्ते में जो आयेगा
उसे मैं हटा दूंगा
एक खरपतवार सा ही
उखाड़कर फेंक दूंगा
मुझे पसंद आती है अब तो
एक पारदर्शी फर्श पर
बनती बिगड़ती मेरी ही
परछाइयां
मुझे नहीं तलाश है किसी
मंजिल की
किसी मकसद की
किसी दर्पण की
मैं क्या हूं
यह मैं जानता हूं
एक दर्पण भी हिमाकत न करे
मुझे यह बताने की कि
मैं कौन हूं
मेरे घर में रहते हुए
एक राहगीर और
वह भी अजनबी
न बताये मुझे मेरे घर का पता
नहीं चाहिए मुझे किसी की
प्रशंसा भरे दो शब्द
यह बनावटीपन मेरा
पेट नहीं भर देगा
मेरी जिंदगी का रास्ता नहीं
कटवा देगा
मुझे मेरे वास्तविक होने का अहसास नहीं करा देगा।
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