मैं खामोश हूं
चुपचाप तन्हा किसी कोने में
दुबककर बैठे रहना
अब मुझे अच्छा लगने लगा है
कानों में गूंजती रहती हैं
मेरे अतीत की यादों की
प्रतिध्वनियां
मंदिर में बजती घंटियों सी
मैं इनकी गूंज से तनिक भी
विचलित नहीं होती
यह तन्हाई के वातावरण में
एक शहनाई की मधुर धुन सी
बजाती हैं और
मेरे अपने बिछड़ों की यादों की
बारात को सजाकर मेरे द्वार तक
ले आती हैं।
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