कमरे के पर्दे को हटाया
इस उम्मीद के साथ कि
अंदर तो अंधकार है
शायद बाहर उजाला हो लेकिन
बाहर तो अंधेरा काला स्याह था
कुछ भी नहीं दिख रहा था
न आसमान
न चांद
न सितारे
न कोई दिलकश जमीं के नजारे
न ही कोई गतिविधि जैसे कि
कोई बादल उड़ता हुआ या
कोई परिंदा आकाश में विचरता हुआ
इससे बेहतर तो यह पर्दा ही है
कम से कम रंगीन तो है
मेरी कल्पनाओं की तरह
आज पर्दा गिराकर क्यों न
मन के भीतर के संसार को
टटोला जाये।
0 Comments