कभी उफ तक नहीं करता


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तड़के सुबह उठते ही
काम करते करते शाम हो जाती है
दिन भर के कड़े परिश्रम से
रात को गहरी नींद आती है
ऐसा लगता है कि नींद पूरी नहीं हुई और
पलक झपकते ही सुबह हो जाती है दिन के उगते ही
बिना किसी बदलाव के
वही दिनचर्या शुरू हो जाती है
जिंदगी ऐसा लगता है जैसे कि
बिना एक भी पल सुकून का लिए
एक झटके में
एक मोड़ पर आकर खत्म हो जाती है पेट की भूख मिटाने के लिए
गले की प्यास बुझाने के लिए
सिर पर एक छोटी सी छत पाने के लिए अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए
अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देने के लिए
एक मजदूर ऐसी कौन सी है मजदूरी जो नहीं करता
न जाने कितने बेहिसाब जख्म अपने जिस्म और सीने पर लिए होता है फिर भी कभी अपने मुंह से उफ तक नहीं करता।


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