मैं भी लगता है
एक मृग ही हूं
जो भटकती रहती है
रेगिस्तान के जंगल में
एक जलाशय की तलाश में
एक सपना बार-बार टूटता है
एक सच भ्रमित करता है
एक मंजिल उम्र भर भटकाती है लेकिन आशा निराशा के भंवर से
कोई कैसे बाहर निकले
रास्ते जो मिलें
उन पर न चले तो
फिर क्या करे
प्यास लगे तो
जल के स्रोत न तलाशे
न बादल की तरफ देखे
न कोई तालाब ढूंढे
दूर से जो दिखे पानी की एक
लकीर
पास पहुंचकर रेत के कणों का
एक जाल निकले
यह जीवन जो मिला है
इसे कोई क्या समझे
एक ख्वाब या एक हकीकत
एक रास्ता या कोई खोई हुई
एक मंजिल
एक बादल या बारिश
एक आसमान या उसका तन्हा चांद एक सूखी बंजर भूमि या उसकी कोख से निकलता कोई फूल
हवायें आंखों में धूल भरें तो
क्या कोई आंखें अपनी बंद
कर ले या
उन्हें कुछ ज्यादा खोलकर
मृगतृष्णाओं के भंवर में
खुद को फंसाने से
बिल्कुल भी न डरे।
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