दिल में
एक सागर की
गहराई है लेकिन
इससे कुछ जीवन में
हासिल हो नहीं पा रहा
सागर में रहकर
सागर से जो नहीं बन पाये तो
इसको भी देखा जाये तो
कहां अपना पाये
न इसमें डूब पाये
न तर पाये
न इसके संग रह पाये
यह तो एक अजीब विडंबना है
सागर का जल खारा है
पीने के काबिल भी नहीं
गागर में भरने लायक भी नहीं
यह तो पहले ही जान लेना चाहिए था मछली को भी न पकड़ पाते हैं
न उसके साथ खेल सकते
न उसे पकाकर खाने की
हिम्मत रखते हैं
गहराइयों में उतरकर
बहुत देख लिया
कुछ भी बड़ा या महान
अंततः हाथ नहीं लगता
अपनी जमीन भी छूट
जाती है
किनारे भी
सहारे भी
अपनी मिट्टी भी
अपना आसमान भी।
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