कृषक तुम महापुरुष हो


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कृषक
तुम कोई सामान्य पुरुष नहीं
महापुरुष हो
अपना कार्य एक कठोर तप की तरह करते हो
सिर पर तेज धूप हो या
सर्दी की ठिठुरा देने वाली ठंड या बारिश की बिजली की गति सी
तीर चुभाती बौछारे
मौसम कैसा भी हो
समय कोई भी हो
तुम एक पल के लिए कहीं
थककर नहीं ठहरते हो
एक घड़ी की सुईयों के साथ ही
अपने कदम की रफ्तार मिलाकर
चलते हो
इतना कमर तोड़ देने वाला परिश्रम दिन रात
सुबह शाम करने पर भी
तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान
फैली रहती है
तुम हम सबकी भूख शांत
करते हो
हमारे अन्नदाता हो
हमें भोजन देते हो
खुद को इसके बदले में कुछ न भी मिले तब भी उफ तक नहीं करते हो
जितना तुम्हारा तुम्हारे कार्य क्षेत्र में योगदान है
उसका कोई मोल नहीं
वह अनमोल है
तुम धरती की मिट्टी से सोना
उपजाते हो
इसका इनाम तुम कुछ भी
तो नहीं पाते हो
यह एक चिंता का विषय है
तुम्हारे बारे में हर जन सोचे
यह सबका दायित्व है।


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