लकड़ी से बनी
एक बस्ती थी
और वह भी धूं धूं करके
जल रही थी
आग की लपटों से
इस कदर घिरी थी कि
कोई एक ऐसा वहां मौजूद नहीं था जो उनकी चीख
पुकार सुन सके
जो उन्हें बचा सके
जो पानी डालकर आग बुझा सके
जो उनके जख्मों को भर सके
जो उनकी मौत को गले लगाती हुई खत्म हो रही जिंदगी
की कहानी को सुन सके।
0 Comments