एक घर के कमरे के
खिड़की दरवाजे
जिसमें हम रहते हों को
कोई आखिरकार कब तक बंद रख सकता है
कब तक रह पायेगा
वह बिना सूरज की किरणों के प्रकाश के
बिना हवा के
बिना आसमान के
हो सकता है
कुछ समय के लिए लेकिन
जब उसका दम घुटेगा तो
वह उन्हें खोलना चाहेगा
सूरज की तपिश में नहाना चाहेगा ताजा हवा के झोंकों को अपनी सांसों में भरना चाहेगा
आसमान के बादलों को,
उसके रंगों को,
उसमें उड़ते परिंदों को देखना
चाहेगा
किसी दूसरे की गलतियों की
सजा वह क्यों भुगतेगा
आखिर तकिये से अपने चेहरे को ढककर
कब तक सुबक सुबक कर रोयेगा
अपने को समय रहते नहीं जगाया तो यह जिंदगी ऐसे ही
रोते हुए गुजर जायेगी
खुद की शक्ति को कभी
कम नहीं होने देना है
खुद के अधिकारों की रक्षा के
लिए पहला कदम उठाने
के लिए खुद को ही
समय समय पर प्रेरित करते रहना है अपना बचाव पहले खुद ही
करना है
अपनी जीवन की दिशा
निर्धारित स्वयं को ही करनी है
पहला कदम जो नहीं उठाया तो
मंजिल कैसे हाथ आयेगी और
दुनिया के लोगों के कदमों के
साथ का कारवां आगे कैसे
बढ़ेगा जब
अपना ही मन शक्तिशाली
महसूस नहीं करेगा।
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