दरख्तों के शामियाने थे
मोहब्बत से लबरेज
उनके नीचे बसे चंद अशआर से
कुछ सावन की रिमझिम फुहारों में भीगे
कहीं से पक्के तो
कहीं से कच्चे आशियाने थे
उसमें जो लोग रहते थे
बेखबर से
वह उनके घर की चौखट पर आने वाले किसी मेहमान के कदमों की आहट से अंजान थे
दरवाजे जो खुले तो
सदियों बाद जैसे हो किसी की आंख खुली
मुलाकातों का एक लंबा दौर चला
बंद दिल की खिड़की की चिटकनी का जाम हुआ तना हुआ तन भी एक अरसे बाद
एक छोटे से झरोखे सा ही खुला।
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