बिना मां के


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पत्थर की चट्टान से
एक फूल उग रहा था
दूर से देखने पर ऐसा लगा था
पास जाकर देखा तो
उसके बीच कहीं एक दरार थी
जहां कहीं थी जो मिट्टी तो
वह फूल तो वहां से निकल रहा था
यह मिट्टी उसकी मां थी
उसकी कोख से जन्म ले रहा था
उसकी गोद में पल रहा था
सूरज की एक किरण देखने को
लालायित था
बिना मां के उसकी किसी भी हसरत का हकीकत में बदलना पर नहीं था संभव इस बात से अंजान था पर
कहीं जाने अंजाने उसे समझ भी
रहा था।


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