‘ताजमहल’ इस नाम को सोचने भर से


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ताजमहल
की सुंदरता
हर किसी को आकर्षित करती है
तभी तो दुनिया के हर कोने से
लोग इसके दीदार करने आते हैं 'ताजमहल'
इस नाम को सोचने भर से
जेहन में शाहजहां और मुमताज महल की
प्रेम कहानी उभर आती है
मोहब्बत एक दूसरे के लिए
दो दिलों में कैसे
इतने लंबे समय तक
एक रूप
एक रस
एक जान होकर बस सकती है
यह जटिल बात आसानी से समझ आती है
मोहब्बत जिंदा रहती है
किसी के मरने के बाद भी
यह हकीकत एक सितारे की तरह
आंखों की चिलमन पर झिलमिलाती है ताजमहल को देख
कोई अपनी सुधबुध खो सकता है
उसके जर्रे जर्रे में गूंजती हुई
मोहब्बत की शहनाई को सुनकर
कोई मोहब्बत की पाकीजगी पर
यकीन कर सकता है
ताजमहल
एक इबादतगाह सा लगता है
ताजमहल
कोई इमारत न होकर
मुमताज महल का ही संगमरमर से तराशा हुआ बदन लगता है
ताजमहल के पीछे से निकलता
चांद
शाहजहां का इश्क बरसाता
नूरानी चेहरा लगता है
यमुना में बहती लहरें
ताजमहल को देखती आंखें
आसमां का चांद
बहती हवाओं का कारवां
पदचापों की आहट
सब कुछ खामोश हो जाता है
स्थिर हो जाता है
स्तब्ध  हो जाता है
अभिभूत हो जाता है
आश्चर्यचकित हो जाता है
जब देखता मोहब्बत भरी
एक नजर भरकर मोहब्बत की एक निशानी एक कभी न खत्म होने वाली मोहब्बत की कहानी ताज की
तरफ।


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