मेरी अंतरात्मा के दर्पण से


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मैंने अपने घर के कमरे के
एक कोने में सजा
एक सदियों पुराना
एकमात्र दर्पण को आज तोड़ दिया
उसमें झांकती थी तो
दिखता था
अपने जैसा ही दूसरा कोई
आज उस अपरिचित से भी
मुंह मोड़ लिया
न दर्पण होगा
न मुझे किसी मानव छवि के दर्शन
होंगे
दर्शन होंगे तो
सिर्फ और सिर्फ
मेरी अंतरात्मा के दर्पण से
झांकते
परमात्मा के।


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