जब से मैंने जन्म लिया
तब से देखा है
अपने घर के एक कोने में
लगे हुए
इस इकलौते अशोक के पेड़ को
बचपन में
इसकी डाल पर पड़ा झूला
मैंने खूब झूला है लेकिन
इसके पत्तों को कभी
भूल से भी नहीं तोड़ा है
कोई माला बनाने के लिए
खेलने के लिए या
पूजा में प्रयोग करने के लिए
मेरा इस पेड़ के साथ बहुत पुराना
नाता है
यह रिश्ता अब और अधिक
गहराता जा रहा है जब
मुझे भी पता है और
शायद इसे भी पता है कि
हम दोनों इस जहां में
तन्हा हैं
यह पेड़ आसमान के नीचे
अकेला खड़ा
क्या कुछ नहीं झेलता
सूरज की गर्मी
लू के थपेड़े
सर्द तन्हा रातों का दर्द
पतझड़ की मार
हवाओं की लताड़ लेकिन
खामोश रहता है
कहता कुछ नहीं
प्रकृति का एक हिस्सा है लेकिन
अपने जीवन यापन के लिए
प्रकृति के ही करीब है
हम एक दूसरे को देखकर
बड़े चैन की सांस लेते हैं
यह कहीं नहीं जाता
एक जगह स्थिर खड़ा जैसे
मुझे पुकारता है
दूर से ही मुझे देखकर
अपनी आत्मा की आंखों की
प्यास बुझाता है
दूरी दोनों के बीच कुछ अधिक
नहीं
बस एक टीन का शेड है जो
आड़े आ जाता है
बंदर, गिलहरियां,तोते, कौवे,
कबूतर आदि
सब इसकी डालियों पर
कूदते फांदते रहते हैं
यह इनका सानिध्य पाकर
खुश सा प्रतीत होता है
जब जब मुझे देखता है तो
हरे पत्तों से लद जाता है और
अपनी प्रसन्नता जाहिर करता है
कोई तो है उसका साथी और
वह भी बचपन का
मैं घर के भीतर हूं या
बाहर
रहती तो हरदम ही इसके समीप हूं
यह तथ्य तो यह भी भली भांति समझता है
यह मेरा साथ पाकर आनंदित
होता है और मैं इसका
दोनों एक दूसरे को इसके लिए
धन्यवाद देते नहीं थकते
एक दूसरे के साथ से
हम दोनों कभी नहीं उकताते।
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