एक दिव्य प्रकाश पुंज का ही


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दिन में बादल थे
रात को अंधेरा था
अगले दिन सुबह होने पर
सूरज के उगने का
मेरे मन में इंतजार था लेकिन
निराशा ही हाथ लगी
अगली सुबह भी
आसमान पर काली घटाओं का
पहरा था
कहीं भी उजाले की एक उजली
किरण का न उजाला था
प्रकाश का एक लहराता झिलमिलाता दर्पण
देखने की मेरी चाहत थी
कोई सुबह तो होगी ऐसी जिसमें
सूरज उगेगा प्रकाश की किरणें
चहुं ओर बिखेरता
इस ख्वाब के पूरा होने की
मुझे आस थी
कुछ समय का,
कुछ दिनों का,
कुछ पलों का
बस मुझे इंतजार ही तो करना था
एक क्षण ऐसा भी मेरे जीवन में
आना ही था जब
अंधेरे का कहीं नामो निशान नहीं
रहना था और
एक दिव्य प्रकाश पुंज का ही
एक जगमगाती आत्मा स्वरूप सा
दर्शन होना था।


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