एक फूल सी कोमल हूं
कहने भर को हैं संगी साथी पर
खुद के साथ पल रहे
कांटों की मार खाती हूं
उनके वार से घायल हो जाती हूं
अपने आत्म सम्मान को तार तार होते देखती हूं
दिल छलनी हो जाता है
आत्मा पर भी अक्सर एक जोरदार प्रहार होता है
जिस्म पर जख्मों के निशान हैं
बेहिसाब
सिर से पांव तक कोई कोना ऐसा नहीं बचा जो
बेइंतहा दर्द से न करहाता हो
फिर भी यह मेरी प्रकृति है
प्रभु के द्वारा प्रदत्त
एक कुदरती गुण है
मेरा कार्य है कि
खुद के दुख दर्द को भुलाकर
मैं सारे उपवन को अपनी
खुशबू से महकाती हूं
सबको हंसाती हूं
सबको गुदगुदाती हूं
पंछी चहकते हैं
फूल खिलते हैं क्यारी क्यारी
हवा सुगंधित भी चलती है तो
शायद मेरे ही कारण
मैं हूं तो
सारे वाद्ययंत्रों के तार बजते हैं
अपने अपने राग सुनाते हैं
अपना अपना मन में समाया
हुआ संगीत
यह संपूर्ण कायनात एक
फूल सी ही खिल उठती है
मेरा सानिध्य पाने को तरसती है
इतना तो मैं खुद के बारे में जानती हूं आत्मविश्वास को तोड़ने की कोशिश तो हरदम करता है मेरी हर कोई लेकिन
उस दौलत को किसी भी कीमत पर नहीं खोती हूं मैं।
0 Comments