मन के भीतर स्थापित एक अदालत कक्ष


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कभी गौर से देखना
कोई दिन किसी व्यक्ति का
ऐसा नहीं गुजरता होगा जो
बिना शिकवे शिकायतों के हो
एक अदालत कक्ष तो किसी के
मन के भीतर स्थाई रूप से
स्थापित होता है
वह आदमी
फरियाद करता है
मुलजिम पर इल्जाम लगाता है
एक सही फैसला देर से सही लेकिन उसके हक में आये
यह आस बांधता है
एक न्यायोचित फैसला वह खुदा के हाथों में छोड़ता है
इस दुनिया में चल रही
अदालतों से उसका भरोसा
उठ चुका है
उस जिद्दी स्वभाव के
व्यक्ति ने यह ठान लिया है कि
वह मरते दम तक हार नहीं मानेगा
अपनी जिंदगी की जंग लड़ेगा
बेखौफ होकर
हर रोज नई चुनौतियों का
सामना करेगा
किसी दुश्मन को कभी
नुकसान नहीं पहुंचायेगा
कानून को कभी अपने हाथों में
लेने की भूल नहीं करेगा
अपनी मानसिक शांति के लिए
जिंदगी के वह कुछ महत्वपूर्ण
फैसले बस ऊपर वाले के हाथों में
छोड़ेगा
उस सर्वोच्च अधिकारी के फैसले उसे मान्य होंगे
भगवान उस पर अपनी कृपा
अवश्य बरसायेंगे
इस धरती पर जब वह उसे लेकर
आये हैं तो
इस जिंदगी का कठिन सफर भी
वही तय करायेंगे।


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