मेरे पापा की कार
मेरी कितनी अपनी थी
वह मेरी उतनी ही अपनी थी
जितने थे मेरे पापा
यह कार भी मेरे पापा की तरह ही
सुंदर, सुसज्जित और स्वाभिमानी थी उसमें अपने कदम आगे बढ़ाकर
बैठने का,
सैर करने का,
मौज मस्ती करने का
मन करता था
कोई संकोच का भाव नहीं था
किसी तरह का उसे इस्तेमाल करने में
डर नहीं था
किसी तरह का उससे कोई पर्दा नहीं था वह मेरी थी
उस पर मेरा पूरा अधिकार था
जैसा था अपने पापा पर
कार में न भी घूमने की सोचो
लेकिन
वह दूर से खड़ी हुई ही कितनी
अच्छी लगती थी क्योंकि
उससे मेरा रिश्ता प्रगाढ़ था मेरे पापा की ही तरह।
0 Comments