ऐ मेरी आंखों


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यह मौसम है
अवसाद का
दुख का
पतझड़ का
ऐ मेरी आंखों
ऐसे अवसर पर भी
तुम हंस रही हो
मुस्कुरा रही हो
खिलखिला रही हो
तुम्हें तो रोना चाहिए
आंसुओं को बूंद बूंद बरसाना चाहिए
इस शोक की घड़ी को
एक उत्सव सा नहीं मनाना चाहिए
तुम्हें चलना उत्तर की दिशा में है तो
तुम दक्षिण की राह पकड़ रही हो
तुम्हें जब होता है हंसना
तुम रोती हो और
जब चाहिए रोना
तुम हंसती हो
तुम्हारे क्रियाकलाप मेरी समझ से परे हैं न जाने किस मिट्टी से बनी हो
यूं तो कहने को अपनी हो
मेरे प्रश्न अनेक है लेकिन उत्तर एक का भी पाकर मैं संतुष्ट नहीं
मन मंजिलों की तरफ जाते हुए रास्तों की तरफ कदम बढ़ा नहीं पा रहा
किसी भी प्रश्न का कोई ठोस उत्तर मिल नहीं पा रहा।


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