यह गुस्सा कहां से आता है
एक सुंदर कन्या के चेहरे के नाक नक्श को बिगाड़ जाता है
दर्पण भी उसे यह कहने को बाध्य हो जाता है कि
सुनो सुंदर लड़की
इतना क्रोधित होना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए भी हितकर नहीं
कहीं कुछ बदलने वाला नहीं लेकिन
तुम किसी दिन यूं ही धरी की धरी रह जाओगी
जहां खड़ी हो वहीं की वहीं सीधी मिट्टी में
धंस जाओगी
जिंदगी से न चाहते हुए भी बिना बात
हाथ धो जाओगी
बेवजह भरी पूरी जवानी में ही
मौत को गले लगाओगी
एक फूल सी नहीं मुस्कुराओगी
एक धधकते हुए आग के
अंगार चारों ओर छलकाओगी
क्या यह सब शोभनीय है
हो तुम चाहे सच्ची सिर से पांव तक लेकिन इस सच की चीख पुकार
इस भीड़ भरी इस दुनिया में भी भला
कोई सुनता है
हर कोई तुम पर प्रहार कर रहा है
एक फिर तुम हो कि इतना
गुस्सा खाकर खुद का
इस कदर नुकसान कर रही हो
दर्पण समझा तो ठीक ही रहा था
उस क्रोधित लाल पीली
हुई लड़की को
दर्पण की बात में दम था
लड़की ने भी उस दिन से
यह प्रण लिया कि
जब कभी आयेगा उसे गुस्ता
दर्पण के सामने खड़ी हो जायेगी
गुस्से को पूरे वेग से अपने
भीतर से बाहर निकालकर थूक देगी और मुस्कुरायेगी
एक बार नहीं
बार-बार
हजार बार
अपनी चांद सी सुंदरता पर
उसे क्रोध की अग्नि का
कोई धधकता हुआ दाग लगने जो नहीं देना था।
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