खुद की यात्रा
खुद तक
जब जीवन का सफर
आगे का
खुद को साथ लेकर ही पार
करना है तो
इससे पहले
थोड़ा बहुत भी किसी को साथ
लेकर क्यों चलती रही
इस दुनिया में हारकर
कहीं लोग खुद का या
फिर भगवान का हाथ ही
थामते हैं
इंसान इंसान के काम आते तो
यह धर्म में आस्था और
भगवान में विश्वास जैसे
विषय सम्भवतः नहीं भी होते।
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