भीड़ में भी
कितना अकेलापन है
भीड़ है ही कहां
लोग हैं ही कहां
यह दुनिया है ही कहां
कहीं कुछ नहीं है
दूर तक निगाह दौड़ाओ
कुछ नहीं है
किसी कण का एक क्षण के लिए भी अस्तित्व नहीं
एकाकीपन मन के भीतर
आजकल समा गया है कुछ ऐसे कि
कोई दिल पर चोट करे
एक पत्थर उठाकर मेरी तरफ फेंके
मुझे मारे
तब ही उसके स्पर्श से होती है
मेरी अंतरात्मा जागृत
थोड़ी बहुत देर के लिए।
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