जमीन और आसमान
एक क्षितिज पर मिले हुए से दिख रहे हैं यह रास्ता और मंजिल भी
एक मोड़ पर कहीं एक दूसरे को
पाते से लग रहे हैं
हर किसी को हो जाता है
कुछ न कुछ हासिल
थोड़ा या बहुत
इससे क्या फर्क पड़ता है लेकिन
उसके मन मुताबिक
उसके अनुसार
उसकी चाहतों के एक समुन्दर को
कहीं थोड़ा बहुत सही पर
पूरा करता हुआ
मेरी कहानी का क्या
ऐसा महसूस होता है कि
कभी पूरी नहीं होगी
मेरे खुले हाथों की तरह
खाली ही रह जायेगी
आसमान की तरह
विस्तृत, विशाल, चारों दिशाओं में फैली हुई
एक महान आत्मा सी तो है लेकिन
बिन पानी एक बूंद जल को
तरसती जमीन पर पड़ी
मछली सी ही तड़प कर कहीं
रह जायेगी।
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