मां, उसका बच्चा और स्कूल बस


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मैं अपने बच्चे को
सुबह सवेरे स्कूल बस में जो
बिठाकर आती हूं तो
वह अपने गंतव्य स्थान पर सही सलामत पहुंच जायेगा
इस बात को लेकर आश्वस्त हो जाती हूं वह ठीक-ठाक जब
वापस लौट आता है तो
जान में जान आती है
मेरा बच्चा स्कूल जाते में
फिर वापस लौटने पर
अपनी मां को जो खुद की फिक्र
करता साथ में खड़ा हुआ पाता है तो
मंद मंद एक कृष्ण कन्हैया सा ही मुस्कुराता है
एक फूल सा खिलखिलाता है
एक सितारे सा टिमटिमाता है
एक परिंदे सा उड़कर
वह मेरी बाजुओं के पाशों से
कुछ देर के लिए मुझसे जुदा होकर
अपने दम पर कुछ सीखने
के लिए
उड़ता हुआ सा चला जाता है
अपने स्कूल से वापस
लौट कर फिर दौड़कर
अपनी इंतजार करती मां
की देह से लिपट जाता है।


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