लाल चूड़ियां भाती हैं मुझे
यह लगती सबसे अधिक
सुंदर मुझे
सूरज की तरह ही इनका रंग भी लाल तुम्हारे मुख जैसी ही तेजवान यह
तुम्हें पाकर भी कभी नहीं मैंने पाया
तुम्हें लेकिन
इन्हें अपने हाथों की कलाइयों में पहनकर
जब कभी उतारा मैंने
तब भी इनके पास होने के
अहसास को पाया मैंने
यह लाल कांच की चूड़ियां हाथों की कलाइयों में
जब सजती हैं
तब हाथों के हिलने पर
खनकती हैं
यह जब चटकती हैं तब भी शोर करती हैं
यह टूटती हैं तब भी
आवाज करती हैं
यह जब हाथों में नहीं होती
तब भी अपनी ओर आकर्षित करती हैं अपने पास बुलाती हैं
उनकी खनकती हुई आवाज
कानों में गूंजती ही रहती है
यह करीब हों या
मुझसे कहीं बहुत दूर।
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