दर्द की इंतहा तो देखो
फिजा में
हर तरफ बिखरे रंग
धूमिल से लगते हैं
लबों पे चाहकर भी मुस्कुराहट नहीं आ पा रही
आंखों में आंसू एक बर्फ की लकीर से जम गये
लाख कोशिश करने पर भी नहीं बह रहे हैंं
मंजिल की कहानी छोड़िए
यहां तो अब रास्ते ही तय होते नहीं दिखते
किससे करूं शिकायत
न कोई दोस्त, न कोई दुश्मन
अब तो अपने साये ही
खुद के परछाइयों से मुंह फेरे दिखते हैं।
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