क्या तुम जानते हो कि
मैं एक परी हूं और
परियों के देश में रहती हूं
मैं जमीन पर तुम्हें विचरती दिखती हूं तो इससे क्या लेकिन
मैं तो जमीं की कम लेकिन
हां आसमान की बातें ही अक्सर
करती हूं
तुम्हें मेरे पंख नहीं दिखते क्योंकि
तुम्हारे मन की आंखें अक्सर बंद
रहती हैं
मैं अपने पंखों के सहारे ही तो
चांद देश का सफर करती हूं
मैं एक रंगीन ख्वाब हूं जो
तुम्हें तुम्हारी इन नंगी कंचे जैसी गोलाकार आंखों से
दिखती हूं
यह तो तुम्हारी किस्मत अच्छी है कि
मैं तुम्हें बंद किताबों में नहीं बल्कि
एक बादल सी कभी आसमान में
एक तितली सी कभी किसी बाग में
एक गुलाब की रंगत सी किसी
झील के पानी के बहाव में
दिखती हूं
मेरे सामने पड़ने पर भी
तुम्हें मेरे होने का अहसास नहीं होता
सिर से पांव तक नादां हो तुम
चलो एक दिन फुरसत से
मैं तुम्हें अपने देश ले चलूं
और यकीन दिलाऊं कि
मैं एक परी ही हूं
जमीं पर खिले फूलों को
देखकर या छूकर तुमने इन्हें कभी
फूल समझा है
तुम्हारा जवाब यदि 'न' है तो
तुम परियों के देश जाकर भी
मुझे परी मानने को
तैयार नहीं होंगे और
मेरी कहानी तुम्हें कभी समझ
नहीं आयेगी
तुम हमेशा से ही अंजान थे
मेरी कहानी से आगे भी फिर
तुम अंजान ही बने रहोगे।
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