मैं भी तो कभी
एक महल थी
एक किला थी
एक बहुत ही सुंदर
लाल सफेद काले पत्थरों से
निर्मित
कोई इमारत थी
आज मैं खुद को
न जाने क्यों
एक खंडहर सा ही टूटा हुआ
छिन्न-भिन्न
जर्रा जर्रा बिखरा हुआ
महसूस करती हूं
ऐसा लगता है जैसे कि
सदियों से
एक घुटन भरे तहखाने में कैद हूं
अंधकार ही अंधकार
व्याप्त है चारों तरफ
सूरज की एक किरण को
हर रोज तरसती हूं मैं
दिन हो या रात
सब कुछ अंधकारमय
एक समान
जो जितना मकबूल है उसे
यह इतिहास उतना ही ठुकराता है
किसी इंसान में इंसानियत
होनी ही नहीं चाहिए
किसी इमारत में कोई बनावट
किसी लिखावट में कोई सजावट
किसी रिश्ते के दर्पण में कोई इबादत होनी ही नहीं चाहिए।
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