मैंने पहनी हुई है
एक पत्तों की पोशाक
अपने जिस्म पर
पतझड़ का मौसम था
पेड़ के सारे पत्ते झड़ चुके थे
कुछ हवा संग उड़ गये थे
कुछ जमीन पर इधर-उधर बिखरे पड़े थे मैंने उन्हें उठा लिया
अपनी झोली में भर लिया
पेड़ के ही सूखे तिनकों से उन्हें
आपस में जोड़कर सिल लिया
पत्तों से बनी उस दुशाला से
खुद के बदन को ढक लिया
पेड़ भी जो दिख रहा था
मुझे नग्न अवस्था में
उसको मैंने सूती धागों से
बने एक कपड़े के थान
से लपेट दिया
किसी पेड़ के तने के
चारों ओर जैसे कोई
मन्नत का धागा सा बांध
दिया
दुआ मेरी उसके लिए कि
बहारें एक बार फिर लौट आयें
और उसे बहुत जल्द
लाद दें उसके फल,
फूल और पत्तों से
उसे एक बार फिर हरा भरा कर दें
उसका खोया हुआ सौंदर्य
उसे वापस लौटा दें
उसको फिर से उसके
पुराने स्वरूप में
पहुंचा दें।
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