न जाने क्यों प्रेम है दुर्लभ


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प्रेम की प्यासी
प्रेम के तत्व को खोजती फिरती हूं
मिलता भी है कहीं पर
थोड़ा बहुत और
वह भी बस कुछ समय के लिए
पलक झपकते ही फिर आंखों के
सामने से हो जाता है ओझल ऐसे जैसे कि
हकीकत या सच न होकर
दिन के उजाले में खुली आंखों से
कोई सपना देखा था
प्रेम प्रकृति में हर किसी को चाहिए लेकिन न जाने क्यों है यह दुर्लभ
प्रेम को पाने की भटकन तो रहती है लेकिन
जीवन है कि फिर भी चलता ही
रहता है इसे प्रेम न मिलने पर भी
एक दूसरे से सब परस्पर प्रेम करते रहें तो यह धरती स्वर्ग न हो जाये
न फिर मृत्यु के आगमन पर
कोई घबराये और
न ही मोक्ष पाने की अपनी
कोई इच्छा जताये।


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