एक गुब्बारा हाथ में तुम पकड़ो
दूसरा पकड़ती हूं मैं
गुब्बारों से हो सके तो खेल लो
इससे पहले कि इनकी हवा निकल
जाये और
ये हो जायें बेदम
यह जिंदगी भी तो इन
रंग बिरंगे गुब्बारों जैसी है
जब होती है आरंभ तो
अपने यौवन के चरम पर होती है धीरे-धीरे अपना
रूप, रंग, सुंदरता आदि
सब कुछ खोने लगती है
किसी सांझ को ढलते हुए
एक सूरज की तरह ही।
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