यह जो नदी बह रही है
यह एक दर्द की नदी है
इसके किनारे पर खड़ी मैं
इसमें कोई तरंग उठती नहीं देख
रही हूं
न इसकी लहरों पर कोई नाव तैर
रही है
न इसके आसमान में कोई पंछी
उड़ता दिख रहा है
न इसमें कोई कंवल खिलता
दिख रहा है
न कोई मछली तैरती दिख रही है
एक अकेली मैं ही इसके
किनारे पर खड़ी हूं
यहां मुझे न कोई बच्चा खेलता
दिख रहा है
न कोई जानवर चरता
दिख रहा है
न कोई पेड़ पौधे
न फूल पत्ते
दूर दूर तक
कुछ भी तो नहीं दिख रहा है
एक गहन सन्नाटा है
न जाने मैं घर से निकलकर
भटकती हुई
यहां कैसे पहुंच गई
मेरी परछाई भी इसके ठहरे हुए
पानी पर बन नहीं पा रही है
न जाने यह कैसी नदी है
न बह रही है
न थम रही है
न किसी को साथ लेकर चलती है
न किसी से अपना दुख बांटती है
मुझ जैसा कोई भूला भटका
इसके पास आया तो
उसे भी नहीं अपनाती है
हर किसी को ठुकराती चली
जाती है लेकिन
एक बात है इसकी अनोखी जो
मुझे अचंभित करती है कि
लाख दुश्वारियां सही पर
फक्र से सिर उठाकर
अपने दम पर
यह फिर भी जिये चली जाती है।
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