कहां हो तुम
मुझे कहीं दिखते क्यों नहीं
मुझसे तुम मिलते क्यों नहीं
मुझसे बातें करते क्यों नहीं
जैसे मैं तुम्हें करती हूं याद
वैसे तुम मुझे याद करते क्यों नहीं
एक तुम ही तो थे जो
करते थे मुझसे बेइंतहा प्यार
अब वह प्यार कहां खो गया तुम्हारा
दिल कौन सी पत्थरों की
शिलाओं में जाकर सो गया कि
वह अब धड़कता नहीं दोबारा
मैं रो रो कर थक चुकी हूं
आंसू सूख गये
कभी-कभार तुम्हारी यादों के सायों से झिलमिलाते तैर जाते हैं
मेरी पलकों के किनारों पर और
भिगो देते हैं मेरे चेहरे के
गालों को
आंख पत्थर हुई
आंसू पत्थर हुए
तुम्हारी ही तरह
तुम्हारी कोई खता भी तो नहीं
तुम्हारा दिल पत्थर का
हुआ
तुम्हारी आत्मा पत्थर की हुई
इसका एक ठोस कारण
तुम्हारी देह जो पत्थर की हुई।
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