जहां धरती और आकाश मिलते हों चलो वहां चलते हैं


0

जहां धरती और आकाश मिलते हों

चलो वहां चलते हैं

उनका सुखद मिलन देखकर

मैं भी खुश हो जाऊंगी

पल भर के लिए लेकिन

मैं वहां किसके साथ जाऊंगी

कौन चलेगा मेरे साथ

मेरा साया

मेरी परछाई

मेरा तन, मन, आत्मा

जो भी चलेगा

वह मुझसे ही जुड़ा होगा

कुछ पृथक होगा जो मुझसे

वह क्या होगा

धरती और आकाश भी

एक होंगे वहां तो फिर

मेरा उस जगह पर भी कौन होगा

न जमीं पर कोई आसमां मिला कभी

न आसमां पर उसका कोई रंग

सारे रंगों को देखकर भी मैं पा न सकी कोई एक भी रंग लेकिन

प्रसन्नता से खिल उठती हूं मैं

जब धरती और आकाश को

एक रेखा पर कहीं मिलते देखती हूं और  

क्षितिज से उनके प्रेम का एक सूरज

उदय होते देखती हूं।


Like it? Share with your friends!

0

0 Comments

Choose A Format
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals