पृथ्वी की सहनशीलता की भी
एक सीमा है
उसकी हरदम अग्नि परीक्षा मत लो उसके कंधों पर जो बोझ
लादा हुआ है
निरंतर बढ़ती जनसंख्या, भारी वाहनों, भारी भरकम संसाधनों,
गगनचुंबी इमारतों,
उम्र से लंबी सड़कों आदि का
उसे कम करने का प्रयास करो
उसकी नाक में जो भरते रहते हो
प्रदूषण के काले धुएं का जहर
वह जब उसके पेट में पहुंचेगा तो
उसके पेट में पल रहे उसके बच्चों का
या उसका पेट जो फटा एक ज्वालामुखी सा
और लावा फैल गया चारों तरफ तो सबका अंत क्या होगा
क्या इसकी कल्पना कर पाना भी होगा सहज
पृथ्वी को ही जो सांस नहीं आयेगी तो वह मानव जाति का कल्याण
कैसे कर पायेगी
उसको सांस आयेगी तो सबको सांस आयेगी
हम सबकी सांसों का तो स्रोत ही
वही है
पृथ्वी ही आग में झुलस जायेगी
तड़प तड़प कर मर जायेगी तो
किसी भी जीव की काया कब तक बच पायेगी
यह प्रकृति की छटा जो धूमिल हो जायेगी
पेड़ पौधों की हरियाली जो मुरझाकर पीली पड़ जायेगी तो
चाहे वह नदी का जल हो
या आकाश से बरसता पानी
सबको सुखा जायेगी
पृथ्वी में नमी जो समय के साथ
सूखती चली जायेगी और
यह टुकड़ा टुकड़ा होकर
दरारों से भर जायेगी
अपनी सांसों को जो एक-एक करके छोड़ने लगेगी
दम तोड़ने लगेगी
अपनी आखिरी सांस त्यागने लगी
तब कौन सी होगी वह प्रार्थना जो
मानव जाति के वर्चस्व को
बचाने में सफल हो पायेगी।
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