जिस घर में मैं रहती हूं
जो मेरे मां-बाप का घर है
जहां मैं पैदा हुई
जहां मेरा बचपन बीता
जिस घर के जर्रे जर्रे से
मेरी यादें जुड़ी हैं
जो मेरा शहर है
मेरा मोहल्ला
मेरी गली
मेरा इलाका
मेरे अपने लोग
मेरा अपना कमरा
अपना सामान
अपनी छत
अपना बरामदा
अपना आंगन
अपना पेड़
अपनी जमीन
अपना आसमान
अपने वही पुराने पड़ोसी
अपने वही पुराने दोस्त
वही स्कूल
वही दुकानें
देखा जाये तो कुछ खास बदला नहीं
जब दिल नहीं बदलता तो
आसपास का परिवेश भी कुछ हद तक नहीं बदलता
यह तो बात हुई उस घर की
जिसमें मैं बचपन से आज तक रहती चली आ रही हूं
फिर एक मकान मैं खुद में
भी हूं और
मैं जहां कहीं उठकर चली जाती हूं
वह जगह भी मुझे मेरी विरासत सी ही लगती है
मैं हर जगह एक जुड़ाव का अनुभव करती हूं
बिखराव का नहीं
मैं किसी भव्य इमारत को देखती हूं
तो उसके इतिहास के पन्नों को पलटती हुई
उसमें ही कहीं रम जाती हूं मसलन
गर मैं कहीं पहुंच गई ताजमहल को देखने तो
मैं उसकी मालकिन बन जाती हूं
खुद को जब तक वहां होती हूं
मुमताज महल से कम नहीं समझती
यह जो अहसासात को खुद में पैदा करके कुछ देर के लिए जिया जाता है
इसको दुनिया की कोई ताकत
तुम्हारे हाथों से नहीं छीन सकती
आदमी ख्यालों में जो सोचे उसे
यथार्थ में भी पा सकता है
अपने घर को ही नहीं
इस सारी दुनिया जहां को वह अपना
घर कहने का फरमान एक बादशाह की तरह जारी
कर सकता है।
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