किसी इंसान का दिल ही गर इस दुनिया के रेगिस्तान में भटक गया तो


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किसी का कभी दिल न टूटे

किसी की मोहब्बत उससे कभी न रूठे 

जिंदगी रहते हुए भी जिंदगी का साथ न छूटे

अपनों के होते हुए अपनों की अपनाहट कहीं कम न हो

अपना घर होते हुए भी 

एक परायेपन का उसमें रहते हुए यह अहसास 

कहीं मन के किसी मासूम से कोने में न पनपे

यह सारे अहसासात दिल को तोड़ने वाले,

आत्मा को झकझोरने वाले और

जिंदगी का रूख एक अंजान दिशा की तरफ मोड़ने वाले होते हैं

कोई कांच का बर्तन टूट जाये

कोई शीशे का दर्पण चटक जाये

कोई लकड़ी का खिलौना जल जाये

कोई प्लास्टिक का फर्नीचर उखड़ जाये 

कोई तिनकों का घरौंदा एक तेज

आंधी में तिनका तिनका यहां तहां बिखर जाये

यह सब समय के साथ ठीक हो जायेगा 

इसके बदले नया कुछ बेहतर आ

जायेगा

इनके न रहने से जीना कोई दूभर

नहीं हो जायेगा लेकिन

किसी इंसान का दिल ही गर

इस दुनिया के रेगिस्तान में भटक गया 

फिर वह कौन से दरख्त के नीचे तो

छांव पायेगा

उसका तन झुलस जायेगा

उसके पांव में छाला पड़ जायेगा

उसका बदन छिल जायेगा

उसके कपड़े चिथड़ा चिथड़ा इधर उधर 

एक चिड़िया के कटे हुए पंखों की तरह 

दर्द से कराहते हुए बिखर जायेंगे

उसका गला रूंध जायेगा

उसके मुंह से कोई स्वर नहीं फूटेगा 

उसकी आंख के आंसू सूख जायेंगे 

उसको कहीं भी एक पल का चैन

नसीब नहीं होगा

न किसी जंगल में

न किसी रमणीय स्थल पर

न ही किसी मंदिर में

ऐसे इंसान की बर्बादी की

दशा को भगवान भी सुधार नहीं

पायेगा

अपना नाम भी वह अपनी कांपती अंगुलियों की पोरों से 

आंखों में रेत भरती रेगिस्तान की जमीन पर नहीं लिख पायेगा।


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