किसी से जिंदगी में
कभी पहली बार तो हम मिलते ही हैं
पहली मुलाकात में कोई हमें अच्छा लगता है तो
उससे मुलाकातों का सिलसिला हम उसे अपने निज आवास या किसी
सार्वजनिक स्थान जैसे होटल, रेस्टोरेंट, कॉफी शॉप आदि पर
भोजन पर आमंत्रित करके ही आगे बढ़ाते हैं
जब किसी नवजात शिशु का जन्म होता है तो
उसकी मां उसे अपना दूध पिलाकर ही उससे एक अटूट रिश्ता जोड़ती है
किसी के यहां से कभी किसी भी अवसर पर
भोजन का आमंत्रण मिलने पर
मन प्रसन्नता से भर उठता है और
जाने अनजाने उससे रिश्तों में
प्रगाढ़ता बढ़ती है
किसी के घर अतिथि बनकर जाओ और चाय, नाश्ते या भोजन की थाली
आगे परोसकर स्वागत न हो तो
सिर्फ बातों से पेट नहीं भरता
मुलाकातों का दौर भी जागृत हो
जाता है जब साथ में
चाय, शरबत, पकवानों, स्वादिष्ट व्यंजनों आदि के सिलसिले चलते रहें
कोई भी समारोह क्या बिना भोजन की व्यवस्था के संपन्न हो सकता है!
किसी सार्वजनिक स्थान पर भी कोई बैठा हो
और उसे कोई अनजान व्यक्ति कुछ
खाने का पूछ ले तो फिर वह बहुत देर तक
एक अजनबी नहीं रहता
भोजन एक ऐसा तत्व है जो
पेट में पहुंचते ही खिलाने वाले के
दिल तक पहुंचने का रास्ता बना लेता है
किसी से दिल से प्यार नहीं होगा तो
उसे आप भोजन पेश नहीं कर पायेंगे
किसी को दिल से भोजन कराना आपकी श्रेष्ठता को सिद्ध करता है और
रिश्तों को जोड़ने में एक
बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है इसमें कोई संदेह नहीं
किसी को आदर से भोजन नहीं
करायेंगे तो खून के रिश्तों में भी
दरार आ जायेगी और
किसी को प्रेमपूर्वक, पूर्ण मनोयोग से, सम्मानपूर्वक एक टॉफी भी उसके
हाथ में देंगे तो उसे वह किसी प्रसाद से कम नहीं लगेगी और
रिश्ते तो जिनकी कोई सीमा नहीं होगी उससे बंधेंगे ही।
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