यह समय कहीं ठहरा हुआ है
एक पल की धड़कती सी सिलवट में कहीं
सिमटा हुआ है
एक चांद की तरह रात के आसमान में
मेहमान बनकर लहरा रहा है
खामोश दिख रहा है लेकिन
भीतर से कहीं
अंदर ही अंदर घबरा रहा है
चांद के जिस्म से चांदनी की
कई परतें उतरें तो
उसके कहीं भेद जो सदियों से दबे
पड़े थे
उजागर हो नहीं तो
करवट बदलकर फिर वह सो जायें अगली सुबह होने तक।
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