कोई परिचित हो या अपरिचित
अपना हो या पराया
उसकी आंखें बंद हों या खुली
वह तुम्हारी तरफ देख रहा हो या नहीं
वह तुम्हें देख मुस्कुराता हो या नहीं
इन सबको दरकिनार कर
यह मानना सबसे मुनासिब है कि
हर कोई इस दुनिया में मेरा अपना है
हर कोई मेरा परिचित है
हर कोई मुस्कुराती हुई एक अपनाहट भरी
आंखों से जी भरकर मुझे देखता है
दिल में हर समय यह भाव उत्पन्न नहीं किया तो
जीना दुभर हो जायेगा
दिल की आंख से हर किसी की आंख में
चाहे वह फिर कितनी भी क्यों न हो अपरिचित
अपनापन तलाशने की पुरजोर कोशिश बदस्तूर जारी रखनी चाहिए
किसी से अपनाहट न भी मिले
उस समय भी प्रयत्नशील रहें
उसे अपना बनाने की
उसमें अपनाहट का जज्बा जागृत करने की
उसकी आंखों में हर किसी के लिए अपनाहट का भाव जगाने की
किसी के पत्थर दिल को कोई पिंघला सके या
किसी की पत्थर की आंख में भी कोई आंसू की एक लहर लहरा सके तो
समझ पाऊं मैं कि किसी ने इस जिंदगी की बाजी
कुछ हद तक तो फतेह कर ही ली।
0 Comments