दिल में हो प्यार तो
चारों तरफ बिखरे रहते हैं
प्यार के रंग भी
कोई आंखों के सामने
हो या न हो
उसे पा लेते हैं
वह चाहे करीब हो नहीं भी
कोई दूर हो या
हो नजदीक
उसके प्रेम के फूल की गंध
अपनी आत्मा के उपवन में
महका लेते हैं
एक मेहंदी के खिले बूटे सा ही
हाथों की हथेलियों पर रचा लेते हैं
चांद के दर्पण सा ही
मन के झिलमिल आंगन में उतार
लेते हैं
एक फूल की सूखी देह सा ही
जिंदगी की किताब के दो पन्नों के
बीच रखकर कहीं उम्र भर के लिए
फंसा देते हैं
एक दीपक की बाती सा ही उसे
धूप अगरबत्ती की सुगंध साथ लिए
उसकी ही चिंगारी से उसे सुलगा देते हैं
एक तितली के रंगों का आवरण
स्वयं की चंदन की लकड़ी सी देह पर चढ़ा लेते हैं
किसी के प्यार के रंग की एक
पारदर्शी बूंद को सतरंगी रंगों के
संसार से भरकर दिल के एक गहरे प्रेम के समुन्दर में
आहिस्ता आहिस्ता उतार लेते हैं।
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