जिंदगी की किताब को
बंद पड़ी रहने दो
एक कोने में पड़े हुए
इसे सिसक सिसक कर रोने दो
हंसने की
मुस्कुराने की
कुछ पल और जीने की
अब आगे कोई कोशिश नहीं होगी
इसका कोई पन्ना मैं पलटने की
कोशिश करूं
यह गुस्ताखी मुझसे नहीं होगी
बहुत रुलाया है इसने मुझे
अब मैं भी इसे सताऊंगी
जिन जिन किरदारों ने मुझे तंग
किया है
मेरे दिल,
मेरी आत्मा को दुखाया है
उनकी कहानियों को मैं
सिर से पांव तक जलाऊंगी
बात हद से आगे बढ़े तो
नाराज होना भी लाजमी है
शराफत, नजाकत,
मासूमियत वैसे भी
आज के जमाने में किसी को रास
कहां आती है।
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