बारिश की वह आखिरी बूंद


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आसमान से बरसी हुई

सारी बारिश सूख गई

बस बारिश की वह आखिरी बूंद

मेरे कमरे की खिड़की के शीशे से फिसलती हुई

उसकी लकड़ी की चौखट के बीच ही 

कहीं फंसकर बची हुई रह गई

अपनी आखिरी सांसें भरती हुई

अपने दर्पण में आसमान के

अस्तित्व को ही चमकाती हुई

अपने अंतिम जीवन के क्षणों में

जैसे उसे ही याद करती हुई

उसके साथ बिताये हुए एक स्वर्णिम युग का 

स्मरण करती हुई

आसमान बेशक अपने स्थान से

उतरकर न आ सकता हो उसके पास लेकिन

वह भी दे रहा हो 

उसे ऊपर से ही जैसे 

अपने हाथ हिलाता हुआ 

अंतिम विदाई।


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