अनकहा प्यार: गरिमा सूदन द्वारा रचित कविता


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अनकहा प्यार मेरा उस बारिश के समान था जो हुई
तो ज़रूर पर मैं उस बारिश में भीगी नहीं!
ख़ुद से ज़िक्र करती कि मन में बातें दबाकर थीं रखी।
मेरा अनकहा प्यार दिल की चारदीवारी में सांसे ले रहा,
दिल के बाहर उसका कोई वजूद ना बन सका!
यह अल्हड़पन का पहला-पहला प्यार था,
जो हर इंसान को एक बार ज़रूर होता होगा।
इस बार मेरे दिल पर इस प्यार ने दस्तक दी,
उसे अपने बस स्टाॅप से गुज़रते देखती थी।
पेट में जैसे तितलियाँ व धड़कनें तेज़ हो जाना, ऐसी भावनाएँ पहले कभी उमड़ी नहीं,
कि बस की सहेलियों से घिरी हुई मैं रहती थी।
मगर उसका इंतज़ार करती थी नज़रें मेरी।
स्कूल में भी कक्षा में खोई रहती उसके ख़्यालों में,
उसे कहूँ ना कहूँ या अनकहा रहने दूँ कि उलझी रहती थी इन सवालों में।
अनकहा ही रहने दिया वह पहला प्यार कि ना उम्र थी सही और ना दिमाग था तैयार!

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