पगडंडिया भी कहीं कर रही हैं इल्तिजा: डॉ .मीनल द्वारा रचित कविता


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खुले आसमान के नीचे
लहराते हुए खेत
कितने स्वच्छंद हैं
आसमान की ही तरह
शायद जमीन से सीखा है
इन्होंने बंधना और
आसमान से खुलना
यह बंधन कितना मोहक है
एक स्वतंत्रता प्रदान करता हुआ
इन हरे पौधों से उगते पीले फूलों की
हर सू फैली हुई सुगंध की तरह
पगडंडिया भी कहीं कर रही हैं
इन लहराते हुए खेतों से इल्तिजा कि
हमें भी अपने बीच या किनारे से ही
कहीं रास्ता दे दो
हमें भी भटकने न दो
अपने आंचल से बांध लो
आश्रय दो
चलो फिर सब मिलकर चलें आज
मिलने और छूने आसमान को।


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