सर्द तन्हा रात है


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सर्द रात है

तन्हाई का आलम है

बेबस यह दिल है

मोहब्बत से भरा यह एक घर है पर खाली है

इसका हर कमरा

हर कोना

हर सपना

कोई नहीं इसका अपना

गुलाब का यह एक गुलशन

महक रहा चंदन बन सा

ओस की बूंदों का साथ है

जिसका दर्पण चटक रहा

एक तृष्णा के भंवर सा

शीत लहर चल रही

घर के बाहर तो

कहीं मन के भीतर भी

आसमान में चांद नहीं,

सितारे नहीं

पहन लिया इसने एक काले

मोमजामे का लिबास

ओढ़ ली एक चादर मैली सी

कोई अपना रूप रंग दिखाने को

तैयार नहीं जैसे

मैं प्यार की गर्माहट

किसी से चुराकर अपनी

ठंडी आहों को उनकी तपिश से

सुलगा लूंगी

सेक लूंगी उनकी अंगीठी में

मैं अपने हाथ और

जला दूंगी उनके घर,

उनके आशियाने,

उनके समय के अमूल्य

सर्द से ठहरे हुए पल।


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