आज से


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कल जो थी

वह मैं ही थी न

बेहद थकी हुई

बहुत उदास

बहुत निराश

दिन निकलते ही

कई बार ऐसा लगता है कि

सांझ हो गई और

सूरज ढल गया

वह अपने तय समय से पहले

अस्त हो गया

कैसे निढाल हो जाता है

एक अच्छा खासा आदमी

कभी कभी

रोजमर्रा के हालातों से जूझते जूझते

लेकिन आज तो फिर

सब ठीक है

चलो कल को भूल जाते हैं

आज से फिर तरोताजा

होकर

एक कली से

अभी अभी खिलकर

एक फूल बने

नये महकते लहकते चहकते फूलों के गुलिस्तां से ही

मुस्काते हैं।


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