तुम्हारी परछाई


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जब दिल का दर्द बांटने के लिए

दुनिया की भीड़

कम लगने लगे और

इसके लोग पराये तो

अपनी परछाई को अपना हमसफर बना

लेना चाहिए

जितना साथ जीवन भर

यह देती है

उतना कोई नहीं देता

हर कदम साथ कदम उठाकर

चलती है

हर सांस में संग सांस भरती है

रोशनी में कुछ समय को

बेशक न दिखे लेकिन

अंधकार के समय तो

एक पल के लिए भी

साथ न छोड़ती है

तुम्हारे दामन से लिपटी रहती है

तुम्हारा हाथ थामे रहती है

तुम्हें गिरने नहीं देती

तुम्हें सम्भाले रखती है

तुम्हारे आगोश में समाई रहती है

ऐसा फिर भला क्यों न हो

आखिरकार जब यह है तुम्हारी ही

परछाई तो।


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